Home Remedies For Stones: पथरी के लिए आयुर्वेदिक औषधि

Home Remedies For Stones: यह आर्टिकल उनलोगो के लिए है जिन्हे पथरी (Stones) की समस्या रहती है। इसमें अश्मरी को ठीक करने या कहे शरीर से बहार निकालने के उन सभी आयुर्वेदिक औषधियों के बारे में बताया गया है। तो चलिए जानते है Stones Home Remedies के बारे में।

Home Remedies For Stones
Home Remedies For Stones

चिरचिरा : Home Remedies For Stones

इसे लटजीरा या अपामार्ग भी कहा जाता है, चिरचिरा का गुल्म 1 से 3 फुट ऊँचा होता है। इसके काण्ड चतुष्कोणी तथा पुष्प पीले गुलाबी रंग के होते है। औषधि के लिए इसका पंचांग, पत्र, मूल और कांड का इस्तेमाल होता है। पथरी के लिए आयुर्वेदिक औषधि के रूप में चिरचिरा के 2 से 4 ग्राम क्षार का सेवन भेड़ के एक कप मूत्र के साथ सेवन करने से अश्मरी बाहर निकल जाता है।

बड़ी इलायची : पथरी के लिए आयुर्वेदिक औषधि

इसका पौधा हल्दी पौधे की तरह होता है जिसकी औसतन उचाई 100 से 200 से. मी. होता है। औषधि और मसाले के रूप में इसके सूखे पके हुए फल एवं बीज का उपयोग होता है। पथरी के उपचार के लिए आयुर्वेदिक औषधि के रूप में इसके बीज और तरबूज के बीज का सेवन करने से अश्मरी में लाभ होता है।

बड़ी अजवायन : पथरी के उपचार के लिए आयुर्वेदिक औषधि

इसे अजमोत या अजमोदा के नाम से भी जाना जाता है, इसका गुल्म 2 से 3 फुट ऊँचा होता है। बड़ी अजवायन के पुष्प सफेद छोटे छोटे छात्रों में होते है तथा इसके फल अंडाकार पीत वर्णी होते है। अश्मरी के उपचार के लिए बड़ी अजवायन के फल का चूर्ण 1 से 4 ग्राम लेने से लाभ होता है।

सफेद मुशली : पथरी के ईलाज के लिए आयुर्वेदिक औषधि

इसकी लता विशाल और कंटकीय होती है, इसकी शाखाएँ धारधार और झुकी हुए होती है। सफेद मुशली के कंटक 1/2 से 3/4 इंच तक लम्बे होते है। औषधि के रूप में इसके रसदार मूल एवं पत्रभास कांड का उपयोग किया जाता है। पथरी के इलाज के लिए आयुर्वेदिक औषधि के रूप में सफेद मुशली के कंद खाने से अश्मरी गलकर बाहर आ जाती है।

तालमखाना

इसे कोकीलाक्ष या इक्षुगंधा भी कहा जाता है, यह एक छोटा कंटक युक्त क्षुप होता है जो नमी वाले स्थान पर उगता है। तालमखाना के पुष्प नीले बैंगनी रंग के होते है। अश्मरी के लिए आयुर्वेदिक औषधि के रूप में तालमखाना के चूर्ण या क्वाथ का सेवन करने से लाभ होता है।

पथरचूर

इसका गुल्म उन्नत किस्म का तथा चिरस्थायी होता है, इसे पर्णबीज के नाम से भी जाना जाता है। इसके पुष्प नलिकाकार रक्तवर्णी होते है। पथरी के उपचार के लिए आयुर्वेदिक औषधि के रूप में इसके पत्ते का स्वरस पिने से अश्मरी में लाभ होता है।

सफेद मुर्गा

इसे शीरियरी, शितिवार या भुरूण्डी के नाम से भी जाना जाता है, इसका गुल्म 2 से 3 फूट ऊँचा होता है। इसके पत्ते लम्बे व् पतले होते है तथा पुष्प मंजरियों में गुंथे होते है। औषधि के रूप में इसेक पत्र और बीज का इस्तेमाल किया जाता है। अश्मरी के उपचार के लिए आयुर्वेदिक औषधि के रूप में सफेद मुर्गा के बीज का चूर्ण एक माशा और एक माशा मिश्री दोनों को मिलाकर 2 से 3 बार सेवन करने से लाभ होता है।

कुन्दरू

इसे बिम्बी या कुंदुरि के नाम से भी जाना जाता है, इसकी लता चिरस्थायी होती है। कुंदरू के पुष्प श्वेत रंग के एक लिंगी होते है। इसके फल पर 10 श्वेत धारियॉ होती है जो पकने पर गहरे लाल रंग की हो जाती है। अश्मरी के उपचार हेतु इसके पत्र, फल तथा मूल का स्वरस 30 मि. ली. दिन में तीन बार सेवन करने से लाभ होता है।

पाथर चूर

इसे पाषाण भेदी के नाम से भी जाना जाता है, इसके गुल्म की ऊंचाई 1 से 3 फूट तक होती है। इसके पुष्प हल्के बैंगनी रंग के होते है। औषधि के रूप में इसका मूल एवं कोमल टहनियों का इस्तेमाल होता है। पथरी के ईलाज के लिए आयुर्वेदिक औषधि के रूप में इसके पंचांग का क्वाथ का सेवन करने से लाभ प्राप्त होता है।

केवुक कंद

इसको केमुक के नाम से भी जाना जाता है, जिसका क्षुप 2 से 3 फूट ऊँचा होता है। केवुक कंद के पुष्प सफेद होते है तथा इनके कोणक पुष्प लाल रंग के होते है। अश्मरी के लिए आयुर्वेदिक औषधि के रूप में इसके भूमिगत कांड का चूर्ण का सेवन करने से लाभ होता है।

बरना

इसका वृक्ष 20 से 30 फिट ऊँचा होता है, फल निम्बू के अकार का होता है। औषधि के रूप में इसके छाल, पत्र और पुष्प का उपयोग किया जाता है। पथरी के इलाज के लिए आयुर्वेदिक औषधि के रूप में बरना के छाल का क्वाथ या चूर्ण का सेवन करने से लाभ प्राप्त होता है।

सफेद जीरा

इसकी खेती होती है जो खेतो में बोया जाता है, जीरा की शाखाएं नाजुक व् पतली होती है। इसके पुष्प छोटे छोटे सफेद रंग के होते है। पथरी के ईलाज में इसके फल का चूर्ण का सेवन लाभकारी होता है।

Home Remedies For Stones
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लुगाठ

इसका वृक्ष मध्यम कद का होता है, पत्ते खुरदरे रोमश युक्त होते है। औषधि के रूप में इसके फल का इस्तेमाल किया जाता है। पथरी के उपचार के लिए आयुर्वेदिक औषधि के रूप में लुगाठ के पक्के हुए फल का सेवन लाभकारी होता है।

थूहर

इसे सेहुंड के नाम से भी जाना जाता है, जिसकी ऊंचाई 10 से 15 फूट होता है। इसके पत्ते शाखाओं के अंत में गुच्छाकार आकर में लगे होते है। पुष्प छोटे छोटे होते है जिसमे हरापन और पीलापन होता है। पथरी के लिए आयुर्वेदिक औषधि के रूप में थूहर के मूल का चूर्ण या कांड का स्वरस पिने से लाभ होता है।

केला

यह एक विशाल वृक्ष जैसा क्षुप है, जो अर्न्तभूमिशायी कंद से अंकुर निकल कर कांड बनता है। केले के पत्ते बड़े तथा मुलायम होते है, फल पकने पर खाये जाते है। प्रयोज्य अंग के रूप में केले का पंचांग, मूल, पुष्प तथा कच्चे फल का इस्तेमाल किया जाता है। पथरी की समस्या होने पर इसके पुष्पों के सत का सेवन करने से लाभ होता है।

सबजा

इसका क्षुप अतिशाखीय सुगंधित व् 1 से 3 फुट ऊँचा होता है, तथा इसकी शाखाएं हरी या फीके पीले रंग के होते है। सबजा के पुष्प चक्राकार बैगनी या हरित वर्णी होते है। औषधि के रूप में प्रयोज्य अंग के रूप में इसके पंचांग, मूल, पत्र तथा बीज का इस्तेमाल होता है। पथरी की समस्या होने पर सबजा के पंचांग के सेवन करने से लाभ होता है।

चीड़

इसका वृक्ष काफी ऊँचा होता है, जिसकी ऊंचाई 100 से 150 फूट होता है तथा गोलाई 6 से 7 फूट होती है। चीड़ के पत्ते लम्बे सुई के आकर के होते है जो शाखओं के अंत भाग पर झुमको में लगे होते है। 9 से 12 के झुमको में 3 पत्र होते है। चीड़ के पुष्प गुच्छों में लगते है, तथा इसके नरमंजरी प्रायः आधा इंच लम्बी 3 से 5 के समूह में होती है। प्रयोज्य अंग के रूप में चीड़ का राल, काष्ठ एवं तेल का इस्तेमाल किया जाता है। पथरी होने पर चीड़ का राल का इस्तेमाल करने से लाभ प्राप्त होता है।

मूली

इसमें रुचिकर, पाचन, वातघ्न, मूत्रल, मृदुरेचक एवं अश्मरीघ्न गुण होते है। मूली का स्वाद कटु तिक्त होता है, प्रयोज्य अंग के रूप में इसका मांसल मूल, पत्र, बीज एवं फल का इस्तेमाल किया जाता है। पथरी की समस्या होने पर मूली के पत्तो का रस तथा मूली का सेवन करने से लाभ होता है।

मंजीठ

यह एक चिरस्थायी लता होती है, जिसकी शाखाएं चौपहल प्रत्येक संधि पर चार पत्र होते है जिसमे दो बड़े तथा दो छोटे होते है। मंजीठ का पुष्प श्वेत तथा गुच्छों में होते है। इसमें ग्राही, रक्तशोधन, बल्य, गर्भाशय संकोचन, शोथहर, मूत्रल, व्रणरोपण, कीटाणुघ्न, कैन्सरशमक, ज्वरघ्न एवं विषघ्न गुण पाए जाते है। प्रयोज्य अंग के रूप में मूल तथा कांड का इस्तेमाल किया जाता है। पथरी की समस्या होने पर इसके मूल का चूर्ण दिन में तीन बार 1 से 3 माशा की मात्रा में प्रयोग करने से लाभ मिलता है।

चोप चीनी

यह एक काष्टीय सघन, शाखित सूत्रारोही फैली हुई लता होती है। चोप चीनी के पत्ते सरल उपपत्र युक्त सूत्रों में रूपांतरित होते है। इसके पुष्प छोटे छोटे छत्रक में होते है। इसका स्वाद अल्प तिक्त होता है। प्रयोज्य अंग के रूप में चोप चीनी का भूमिजन्य कांड एवं मूल कन्द का इस्तेमाल किया जाता है। पथरी की समस्या होने पर इसके मूल कंद का चूर्ण सोंठ चूर्ण व् दूध के साथ सेवन करने से लाभ होता है।

वनभंटा

यह एक बहुवर्षीय गुल्म होता है जिसकी ऊंचाई 4 से 6 फूट होती है, तथा बैंगन के पौधे जैसा दिखाए पड़ता है। इसके पुष्प श्वेतवर्णी या बैंगनी रंग के होते है, तथा इसके फल गोल होते है जो कच्ची अवस्था में हरे व पकने पर पीले हो जाते है। औषधि के रूप में प्रयोज्य अंग के रूप में इसका फल का इस्तेमाल किया जाता है। पथरी में इसके मूल का चूर्ण मीठे दही के साथ सात दिनों तक सेवन करने से पथरी चूर चूर हो कर बाहर निकल जाता है।

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